एडिलेड ओवल की हरी-भरी पिच पर गुरुवार का दिन भारतीय क्रिकेट प्रशंसकों के लिए एक शांत तूफान लेकर आया। यह हार केवल स्कोरबोर्ड पर दर्ज दो विकेटों का अंतर नहीं थी; यह उस विश्वास का पतन था जिसे रोहित शर्मा और श्रेयस अय्यर ने 264 रनों के चुनौतीपूर्ण स्कोर की नींव रखकर सींचा था।
भारतीय टीम ने टॉस हारने के बाद लड़खड़ाती शुरुआत की—एक बार फिर शुभमन गिल और विराट कोहली सस्ते में आउट हो गए। कोहली का लगातार दूसरा ‘शून्य’ (डक) क्रिकेट जगत में एक तीखी फुसफुसाहट (sharp whisper) छोड़ गया। लेकिन फिर, रोहित (73) ने धैर्य का एक ‘काव्य’ लिखा और अय्यर (61) ने अपने स्वभाविक अंदाज से रंग भरा। लगा कि आज कहानी पलटेगी।
मगर क्रिकेट का मैदान भावनाओं का रंगमंच है, और यहाँ का नाटक अंतिम गेंद तक चलता है।
ऑस्ट्रेलिया का ठंडा वार (Australia’s Cold Strike)
265 रनों का लक्ष्य आसान नहीं था, लेकिन ऑस्ट्रेलिया ने इसे एक ‘रणनीतिक पहेली’ की तरह सुलझाया। जब भारतीय गेंदबाजों—ख़ासकर अर्शदीप सिंह, हर्षित राणा, और वाशिंगटन सुंदर—ने विकेटों की बारिश शुरू की, तो लग रहा था कि मैच भारत की मुट्ठी में है। 6 विकेट 246 पर गिर चुके थे, और जीत बस एक औपचारिकता लगने लगी थी।
ठीक यहीं पर, ऑस्ट्रेलिया का नया हीरो उभरा: कूपर कोनोली।
जैसे एक शांत पानी का साँप अचानक हमला करता है, कोनोली (नाबाद 61) ने कोई जल्दबाजी नहीं की। उन्होंने अनुभवी खिलाड़ी की तरह तनाव को सोखा, हर रन को गिना, और निचले क्रम के बल्लेबाजों के साथ मिलकर भारतीय आक्रमण को कुंद कर दिया। यह केवल बल्लेबाज़ी नहीं थी; यह मानसिक युद्ध था, जिसे युवा कोनोली ने भारतीय टीम के अनुभव पर भारी साबित कर दिया।
सबक और सन्नाटा (Lessons and Silence)
भारत ने न केवल एडिलेड में 17 साल बाद कोई वनडे मैच हारा, बल्कि यह हार एक बड़े सवाल को हवा देती है: क्या टीम इंडिया अपनी अगली पीढ़ी के खिलाड़ियों को बड़े दबाव को संभालने के लिए तैयार कर पाई है?
सीरीज़ 0-2 से हाथ से फिसल चुकी है। सिडनी में अब अगला मैच सिर्फ़ ‘सम्मान’ के लिए खेला जाएगा। यह हार एक कड़वा घूँट है, लेकिन शायद यह उस नई शुरुआत के लिए ज़रूरी है जिसकी बात हम इतने समय से कर रहे हैं। भारतीय क्रिकेट को अब इस ‘शांत तूफान’ से मिले सबकों को समझना होगा और आगे बढ़ना होगा।


