धनतेरस का महा-रहस्य: क्यों होती है धनवंतरी और कुबेर की एक साथ पूजा?

धनतेरस का पर्व, जिसे ‘धनत्रयोदशी’ भी कहा जाता है, दीपावली के पाँच दिवसीय उत्सव का प्रथम दिन होता है। यह दिन मुख्य रूप से स्वास्थ्य के देवता भगवान धन्वंतरि और धन के देवता भगवान कुबेर की पूजा के लिए समर्पित है। इस दिन की गई आराधना से केवल भौतिक धन ही नहीं, बल्कि उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घायु का आशीर्वाद भी प्राप्त होता है।

यहाँ इन दोनों देवताओं की पूजा के महत्व और विधि का विस्तार से विवरण दिया गया है:

1. स्वास्थ्य के देवता: भगवान धन्वंतरि (Dhanvantari)

 

धनतेरस का वास्तविक केंद्रबिंदु भगवान धन्वंतरि हैं, क्योंकि यह तिथि उनके प्राकट्य दिवस के रूप में मनाई जाती है।

महत्व:

 

  • समुद्र मंथन से प्राकट्य: पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान धन्वंतरि समुद्र मंथन के दौरान अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। उन्हें भगवान विष्णु का अंशावतार और देवताओं का वैद्य (चिकित्सक) माना जाता है।
  • आयुर्वेद के जनक: उन्हें आयुर्वेद का जनक कहा जाता है। इसलिए, उनकी पूजा का मूल उद्देश्य स्वास्थ्य, निरोगी जीवन और लंबी आयु की कामना करना है।
  • सबसे बड़ा धन: धन्वंतरि की पूजा यह याद दिलाती है कि ‘पहला सुख निरोगी काया’ यानी अच्छा स्वास्थ्य ही सबसे बड़ा धन है। स्वास्थ्य के बिना, भौतिक धन का कोई मोल नहीं है।
  • बर्तन खरीदने का कारण: उनके हाथ में अमृत कलश होने के कारण ही धनतेरस पर नए बर्तन (विशेषकर पीतल या तांबे के) खरीदने की परंपरा है, जो आरोग्य और समृद्धि का प्रतीक हैं।

पूजा विधि (धन्वंतरि पूजा):

 

  1. स्थापना: प्रदोष काल (शाम) में पूजा स्थल पर लाल या पीले वस्त्र का आसन बिछाकर भगवान धन्वंतरि की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।
  2. षोडशोपचार पूजा: उनकी पूजा षोडशोपचार (16 विधियों) से की जाती है, जिसमें आसन, पाद्य (पैर धोना), अर्घ्य, आचमन, स्नान, वस्त्र, आभूषण, गंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य (भोग), तांबूल (पान), आरती और परिक्रमा शामिल हैं।
  3. नैवेद्य: उन्हें चावल, नए धान, फल और मिष्ठान्न का भोग लगाएं।
  4. मंत्र जाप: उत्तम स्वास्थ्य की प्राप्ति के लिए भगवान धन्वंतरि के मंत्रों का जाप करें।
    • मुख्य मंत्र:
  5. आरती: अंत में धन्वंतरि भगवान की आरती करें और उनसे निरोगी काया का आशीर्वाद माँगे।

2. धन के देवता: भगवान कुबेर (Kubera)

धनतेरस को ‘धन त्रयोदशी’ कहने के पीछे भगवान कुबेर का भी विशेष स्थान है। वह देवताओं के कोषाध्यक्ष और यक्षों के राजा हैं।

महत्व:

 

  • खजाने के रक्षक: कुबेर देव सभी प्रकार की संपत्तियों और खजानों के स्वामी हैं। उन्हें धन के सदुपयोग और उसके संचय का प्रतीक माना जाता है।
  • लक्ष्मी जी के सहायक: धनतेरस पर माता लक्ष्मी के साथ कुबेर की पूजा अनिवार्य मानी जाती है। मान्यता है कि लक्ष्मी जी धन प्रदान करती हैं, जबकि कुबेर उस धन की स्थिरता और वृद्धि सुनिश्चित करते हैं। उनकी पूजा से घर में धन की कभी कमी नहीं होती और आर्थिक समस्याएँ दूर होती हैं।
  • दिशा के स्वामी: कुबेर देव उत्तर दिशा के स्वामी (दिक्पाल) हैं। इसलिए इस दिन कुबेर की पूजा करते समय उनका मुख उत्तर दिशा की ओर रखा जाता है।

पूजा विधि (कुबेर पूजा):

 

  1. स्थापना: धन्वंतरि, लक्ष्मी और गणेश जी के साथ ही भगवान कुबेर की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें।
  2. समर्पण: कुबेर देव को चांदी या पीतल के पात्र में नया धान, सिक्के, सुपारी और कमलगट्टा अर्पित करें। कुछ लोग इस दिन अपनी तिजोरी या व्यापार के बही-खातों पर स्वास्तिक बनाकर, उसकी भी पूजा करते हैं।
  3. कुबेर दीपक: घी का एक दीपक (या पीतल का दीया) लंबी बाती के साथ जलाकर कुबेर भगवान की ओर मुख करके रखें।
  4. मंत्र जाप: धन-समृद्धि की वृद्धि के लिए कुबेर मंत्र का जाप करें।
    • मुख्य मंत्र: (इस मंत्र की 11 माला करना बहुत शुभ माना जाता है।)
  5. आरती: कुबेर चालीसा या आरती का पाठ करें।

धनतेरस का समग्र संदेश:

धनतेरस का पर्व हमें यह सिखाता है कि जीवन में सच्ची समृद्धि केवल बैंक बैलेंस से नहीं आती, बल्कि वह उत्तम स्वास्थ्य (धन्वंतरि), भौतिक धन (लक्ष्मी) और धन के कुशल प्रबंधन (कुबेर) के संतुलन से प्राप्त होती है। इस दिन खरीदारी का महत्व सिर्फ भौतिक वस्तुओं को घर लाना नहीं है, बल्कि आरोग्य और समृद्धि को अपने जीवन में आमंत्रित करना है।

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